मैं कहाँ शब्दों में बांध पायी हूँ.......तुम्हे
अब तक जितना भी लिख चुकी हूँ....तुम्हे
फिर भी अधुरा-अधुरा सा रहा है.....
अभी कहाँ पूरी तरह से जान पायी हूँ......तुम्हे
मैं कहाँ शब्दों में बांध पायी हूँ......तुम्हे
मैं कहाँ शब्दों में बांध पायी हूँ......तुम्हे
जब यकीन होता है कि,
तुमने अपना मान लिया है मुझे....
जब भी यकीन होता है कि,
मैंने जान लिया है........तुम्हे,
ये भ्रम भी टूटा है हर बार,
मैं कहाँ खुद में ढाल पायी हूँ.......तुम्हे मैंने जान लिया है........तुम्हे,
ये भ्रम भी टूटा है हर बार,
मैं कहाँ शब्दों में बांध पायी हूँ......तुम्हे ......!!!





