Friday, 1 November 2013

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-2

                  8.                                             
ढूढती कभी-कभी निगाहें जिसे ढूंढ़ती है, 
उसे ही देखना नही चाहती है......!! 

                 9.
नही चाहती कि बहुत लोग पढ़े मुझे,
मेरे शब्द सिर्फ तुम तक ही पहुँच जाये.. 
इतना ही काफी है....!! 

                10.
हम न जाने कब उसकी जिन्दगी का
बीता हुआ कल बन गए,
और वो आज भी हमारे आज में सामिल है.....!!

                    11.
तुम्हे प्यार करने करने की सजा खुद को देती रहती हूँ...
तुम्हे भूल न जाऊं इसलिए...
तुम्हे लिखती रहती हूँ.....!!

                     12.
ये बदलो का गर्जना......
बिजली का चमकना बहुत डराता है मुझे.......
तुम न जाने कहाँ चले गये हो,
वो तुम्हारी बाँहों में सम्हालना याद आता है मुझे.........!!

                  13.   
आज कल कुछ  भी लिखने से डरती हूँ,
 डर है कि...........
कही अपने ही शब्दों में बिखर न जाऊं......!!

                   14.
मुझे नही खबर कि तुम्हारी जिन्दगी में वो कौन सा पल है.....???
जो सिर्फ मेरे लिए हो.....
पर मेरी जिन्दगी का हर इक पल.....
सिर्फ तुम्हारे लिए है..........!!!


Saturday, 26 October 2013

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-1

                       1.
वो दूर हो कर भी मुझसे दूर न रहा कभी                  
मैं पास हो कर भी उसके पास न रही कभी.....!!!
                 
                       2.
मैंने तुम्हे कभी याद नही किया क्यों कि  
मैंने तुम्हे कभी भुलाया ही नही.......!!!


                         3.
वो दूर हो कर भी मुझसे दूर न रहा कभी,
मैं पास हो कर भी उसके पास न रही कभी......!!!

                        4.
तुमसे दूर जितना भी खुद को ले जाती हूँ,
उतनी ही तुम्हारे करीब खुद को पाती हूँ.......!!!

                       5.
कुछ इक पल और रुक जाते तो अच्छा होता,
मेरे बिना कुछ कहे ही....    
तुम समझ जाते तो अच्छा होता.....!!!


                      6.
मेरी आखों को तुम्हारा इन्तजार आज भी है.…
मैं झूठ कहूँ तो कहूँ.....
सच तो यही है......
इस दिल को तुमसे प्यार आज भी है.....!!!


                 7. 
धड़कने तो बेवजह धड़कती है,
ये किसी की सुनती कहाँ है....
लाख समझाने की कोशिश करो,
ये समझती कहाँ है.....!!!                                                    

Tuesday, 15 October 2013

ये जो ख़त मैंने तुमको लिखे है..... !!!

ये जो ख़त मैंने तुमको लिखे है.....                
बंद है इन लिफाफों में...अभी तक,
तुमने खोले ही नही......
कितने रंग-बिरंगे पन्नो पर,
सजे मेरे शब्द.....
तुमने कभी पढ़े ही नही.....!

दिल की बैचेनियों को,
धडकनों की गुस्ताखियों को....
इन खतो में गढ़ा मैंने...... 
मेरे खतो को तुम समझते,
तुम तो इन शब्दों की गहराइयों में,
कभी उतरे ही नही.......!!

सुबह के निकलने से लेकर,
शामो के ढलने तक जिक्र है.... इन खतो में, 
गुजरते लम्हों के साथ,
दिल जो करता तुम्हारी वो फ़िक्र है...इन खतो में 
बंद है कब से कितने राज़,
इन खतो में....
तुमने कभी पढ़े ही नही.....!!!

इन खतो को थाम कर कब से, 
तुम्हारे इन्तजार में बैठी हूँ.....अभी तक 
तुम उन राहो से.......कभी गुजरे ही नही.......!!!!


Monday, 7 October 2013

सीधे सरल शब्दों में, मैंने दिल की बात कही है......!!!

सीधे सरल शब्दों में,                                 
मैंने दिल की बात कही है....
सीधे सरल तरीके से,
तुम्हारे दिल तक पहुच गयी है.... 


सोच समझ कर अगर कहती मैं,
तो बात न इतनी सीधी होती...
वक़्त बहुत लगता फिर तो,
तुम्हारे दिल तक न पहुची होती...... 

होठो तक आते-आते जैसे,
कोई बात ठहर गयी थी... 
सवालो के जवाब पाते-पाते,
जैसे कोई बात उलझ गयी थी... 
अब मैंने न कुछ भी,
सुलझाने की कोशिश की है....
बस सीधे सरल शब्दों में,
सीधी-सीधी बात कही है 
सीधे सरल तरीके से,
तुम्हारे दिल तक पहुच गयी है.....

भावो और एहसासों को,
अल्फाज़ न अपने दे पायी.... 
दिल के जज्बातों को,
आवाज न अपनी दे पायी....
कहने को कुछ मैं कब से,
गहरे शब्दों को ढूंढ़ रही थी..... 
शब्द मिले न मुझको ऐसे,
हार गयी मैं.....
सीधे दिल से दिल की बात कही है.....
सीधे सरल तरीके से,
तुम्हारे दिल तक पहुच गयी है.......!!!

Tuesday, 1 October 2013

अपनी हदों से गुजर रही हूँ मैं...............!!!

अपनी हदों से गुजर रही हूँ मैं,                   
खुद से लड़ने की जिद कर रही मैं...
जाने की रौशनी की तलाश में,
गहरे अंधेरो में उतर रही हूँ मैं.... 

अभी पार समंदर कर रही हूँ मैं, 
लहरों से उलझ रही हूँ मैं..... 
खुद को खो देने के जूनून में, 
समंदर की गहराइयों में उतर रही हूँ मैं....

अभी आकाश को खुद में समेट रही हूँ मैं,
चाँद तारो से लड़ रही हूँ मैं.....
किसी को चाँद देने के जूनून में,
मैं हर हद से गुजर रही हूँ मैं....... 

अभी शब्दों को गढ़ रही हूँ मैं.... 
किसी की ख़ामोशी पढने के जूनून में,
मैं छुपे एहसासों को शब्दों में रच रही हूँ मैं........




Wednesday, 11 September 2013

मेरी ख़ामोशी भी जिक्र तुम्हारा करती है.........!!!

बात जब वफ़ाओ की करती हूँ,                                         
तो जिक्र तुम्हारा होता है...... 
बात जब एहसासों की करती हूँ,
तो जिक्र तुम्हारा होता है.......
बात जब यादो की करती हूँ,
तो जिक्र तुम्हारा होता है......

बात ख्वाबो की करती हूँ,
तो जिक्र तुम्हारा होता है...... 
बात जब सवालो की करती हूँ,
तो जिक्र तुम्हारा होता है...... 
बात जब जवाबो की करती हूँ,
तो जिक्र तुम्हारा होता है......
  
बात जब शब्दों की करती हूँ,
तो जिक्र तुम्हारा होता है......  
बात जब अर्थो की करती हूँ,
तो जिक्र तुम्हारा होता है...... 

बात जब शाम की ढलने की करती हूँ,
तो जिक्र तुम्हारा होता है......  
बात रातो के अंधेरो की करती हूँ,
तो जिक्र तुम्हारा होता है......  
बात जब सूरज निकलने की करती हूँ,
तो जिक्र तुम्हारा होता है......
  
बात जब हवाओं के रुख की करती हूँ,
तो जिक्र तुम्हारा होता है......  
बात जब बादल के गरजने की करती हूँ,
तो जिक्र तुम्हारा होता है......  
बात जब सावन की करती हूँ,
तो जिक्र तुम्हारा होता है......  
बात जब सखियों से साजन की करती हूँ,
तो जिक्र तुम्हारा होता है......  

बात तन्हाई की करती हूँ,
तो जिक्र तुम्हारा होता है...... 
कोई बात करू न करू......
मेरी ख़ामोशी भी जिक्र तुम्हारा करती है.........!!!

Tuesday, 3 September 2013

तुम्हारी तस्वीर उतरने की कोशिश की है मैंने......!!!

                                  

एक बार फिर इन्द्रधनुष के रंगों को लिया है मैंने,
ख्यालो को ब्रश बना लिया है मैंने 
जिन्दगी के कैनवास पर,
तुम्हारी तस्वीर उतरने की कोशिश की है मैंने..... 

खाली पड़े कैनवास पर,
कुछ यूँ आड़ी-तिरछी लकीरे खींच दी मैंने....
जिन्दगी की ठोकरों से फिर से,
सम्हलने की कला सीख ली हैं मैंने...... 
इस बेरंग जिन्दगी में तुम्हारे अक्स के साथ,
कुछ रंग भरने की कोशिश की है मैंने........
एक बार फिर........
जिन्दगी के कैनवास पर,
तुम्हारी तस्वीर उतरने की कोशिश की है मैंने..........!!!