Thursday, 7 May 2015

शब्द ही नही थे.....!!!

आज शब्दों को समेटते हुए,
पूछती हूँ....
अपने शब्दों से,
कि ये मुझे सम्हालते है...
या अपने शब्दों में....
बिखेर देते है....
गर मेरे साथ है तो....क्यों...
कई मोड़ पर,
ये मुझे तन्हा छोड़ देते है.....
कोई जवाब नही दिया,
मेरे शब्दों ने...
या यूँ कहूँ जो जवाब था....
उसके लिये मेरे शब्दों के पास भी,
शब्द ही नही थे.....

Tuesday, 5 May 2015

तुम्हे शिकायते बहुत हो गयी मुझसे....!!!

तुम्हे शिकायते बहुत हो गयी मुझसे....
जो मुस्कराहट मेरी,
तुम्हारे होटों पर मुस्कान लाती थी...
वही आज...
तुम्हे अच्छी नही लगती है....
तुम्हे शिकायते बहुत हो गयी है मुझसे....
जो मेरी बकबक..
तुम्हे  दुनिया की उलझनों,
को भुला देती थी...
वही आज मेरा बोलना भी,
तुम्हे अखरता है...
तुम्हे शिकायते बहुत हो गयी है मुझसे....
जिन आखों में मुझे
अपने लिये प्यार दिखता था...
अब वो मुझ पर गुस्सा करती है....
तुम्हे शिकायते बहुत हो गयी है मुझसे....
जिन हाथों का स्पर्श,
मुझे अपनेपन एहसास दिलाता था,
वो अब बस मुझ पर,
डराने के लिये उठते है...
तुम्हे शिकायते बहुत हो गयी है मुझसे.....
जिन शामो को तुम मेरे साथ,
गुजारने के लिये बेचैन रहते थे,
वो शामे अब हमारे बीच,
आती ही नही है...
तुम्हे शिकायते बहुत हो गयी है मुझसे....
जिन छोटे-छोटे पलों को जी कर,
जिनमे तुम जिन्दगी भर..
के सपने सजाते थे..
वो पल अब तुम्हारे,
सपने में भी नही आते है....
तुम्हे शिकायते बहुत हो गयी है मुझसे....
इतनी शिकायतों के साथ भी,
मुझे तुम्हारा साथ ही चहिये...
मैं हर पल तुम्हारी,
कुछ पलो का गुस्सा..
समझ कर भूलती रही हूँ...
हर पल हर लम्हा,
तुम्हे जैसे मैं पसंद हूँ..
वैसे ही खुद को बनाती रही....
मैं खुद को तो खो सकती थी,
पर तुम्हे खोना मुझे मंजूर नही था...
तुम्हारा साथ देने का वादा है...मेरा...
तुम्हारी शिकायतों के साथ,
भी निभाती रही हूँ....
तुम्हारी शिकायते मंजूर है,
सिर्फ तुम मेरे टूट कर,
बिखरने से पहले,
मुझको सम्हाल लेना...
मुझे कोई शिकायत नही है तुमसे...!!!

Thursday, 30 April 2015

तुम्हारी मुस्कराहटो का इक ख़त....!!!

तुम्हारी मुस्कराहटो का,
इक ख़त लिख रही हूँ मैं...
तुम्हारे होटों की वो मुस्कराहटे,
मैंने मिस कर दी....
जिनकी वजह मैं थी....लेकिन
मैंने उन्हें महसूस किया है...
वो पल जब पहली बार,
मेरे किसी ख्याल पर,
तुम मुस्कराए थे....
वो पहली बार जब...
तुम्हारे खाने के टिफिन में,
कुछ लाइनें लिख कर दी..
उन्हें पढ़ कर जो,
तुम्हारे होटों पर मुस्कान थी,
वो भी मैंने महसूस की थी....
वो पहली बार,
जब किसी सफ़र पर,
तुम्हारे कांधे पर सर रख कर...
मैं सो गयी थी..
तब भी चुपके से मुस्कराए थे तुम..
मेरी शरारतों पर..
मुझ पर गुस्सा कर,
अकेले में उन्ही पर मुस्कराए हो तुम..
वो भी महसूस की है मैंने...
मेरी लिखी पंक्तियों को,
अकेले में बार-बार पढ़ कर,
तुम्हे इतराते...मुस्कराते....
महसूस किया है मैंने....
मुझे ख़बर है कि..
मेरे इस मुस्कराहटो के,
ख़त को पढ़ते ही..
मन ही मन मुस्कराओगे तुम...
मैं देखूं न देखूं..
तुम्हारी मुस्कराहटो महसूस,
तो किया है मैंने....
तुम्हारी मुस्कराहटो का,
इक ख़त लिखा है...मैंने

Wednesday, 15 April 2015

तुम्हे ख़त लिखूंगी.....!!!

मैं तो यूँ ही हर रोज...
तुम्हे ख़त लिखूँगी.....
लम्हे लिखूंगी...पल लिखूंगी.....
तुम्हारी यादो में,
कितनी धड़कती है...
धड़कने लिखूंगी....
तुमसे मिलने के पल,
तुमसे बिछड़ने के,
लम्हे लिखूँगी....
मैं अपने बीते हुये कल,
तुम्हारे साथ...
आने वाले कल लिखूंगी.....
मैं हर रोज़ यूँ ही...
तुम्हे ख़त लिखूँगी....
ढलती शामो की,
कहानी लिखूंगी..
उगते सूरज की,
जुबानी लिखूंगी...
तुम बिन कैसे कटती है..
जिंदगानी लिखूंगी...
मैं हर रोज...तुम्हे खत लिखूंगी.....
कृष्ण की राधा क्यों है....
दीवानी लिखूंगी..
मैं बांवरी....तुमको पिया,प्रिय,
'साजन' लिखूंगी....
मैं तुम्हे खतो में....
अपना मन लिखूंगी...
मैं हर रोज...
तुम्हे ख़त लिखूंगी.....

Tuesday, 24 March 2015

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-15

121.
रंग तेरे प्यार का यूँ चढ़ गया... 
कोई और रंग न चढ़ सका.....

122.
बारिश भी खूब है....
किसी के होटों पर मुस्करा रही है..
तो किसी की आखों से बरस रही है......

123.
इन्तजार का तब अलाम मत पूछिये...
जब कह रहा हो कोई...कि आ रहा हूँ मैं....

124.
मैंने शायद खो दिया है खुद को...
क्यों ना....
मैं कैनवास बन जाऊं..
तुम मुझ पर कोई अक्स उकेर दो..

125.
खोयी हुई चीजो को इक्कठा तो किया जा सकता है...
पर जो खो जाता है..
उसकी भरपाई नही की जा सकती है....

126.
तुम्हारे अक्स को,
अपने शब्दों में उतारना..
अभी बाकी था....
तुम्हारी बाहों में,
मेरा टूट कर बिखरना..
अभी बाकी था....!!

127.
कुछ पल जो मैं,जो तुम्हारे साथ रहूंगी...
मैं तुम्हे अपने हर पल में,
शामिल कर लुंगी...

128.
बेशक मैं तुम्हारी जिन्दगी हूँ...
पर तुम्हारी जिन्दगी के किसी लम्हे में मैं नही हूँ..

129.
तुमको हम दिल में बसा लेंगे...
तुम आओं तो सही...
सारी दुनिया से छुपा लेंगे..तुम आओं तो सही....

130.
जिन्दगी को आसान कर देती है...
तुम्हारी मुस्कराहटे..........

131.
सभी मंजिले तुम्हारी ही है...
मुझे तो सिर्फ तुमको उन तक पहुँचाने रास्ते बनाने है..

132.
हमने हार कर जिन्दगी से सीख लिया....
कि जीतना मायने नही रखता...
लेकिन लड़ना बहुत जरुरी है.....

133.
आज मैं इक धागे में बाँध कर,
उसको सारी दुआए दे आयी हूँ....
खाली हाथ तो मैं भी नही आयी हूँ...
साथ अपने उसकी सारी बलाये ले आयी हूँ.....

134.
तुम भले मुझसे अनजान हो गये...
तुम्हारा शहर आज भी जाना-पहचाना लगता है...
वही तुम तक जाती ये राहें..
आज भी मुझे अपनी ओर खीचती है..
तुमने भले नजरे फेर ली है मुझसे..
तुम्हारे शहर का हर शै मेरी नजरो को बांधती है...

135.
जब भी तुम्हे देखा है...
सब भुला कर..इन आँखों ने सिर्फ मुस्करा दिया है...

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-14

112.
उजाले बहुत थे..मेरे अंधेरो थे लिये....
फिर भी....ता-उम्र तुम्हारी मुस्कराहट का इंतजार करती रही....

113.
वो मेरे इतने करीब से हो कर गुजरा है...
उसके जाने के बाद भी...
मेरे आस-पास..
इक अरसे तक उसका एहसास बिखरा रहा....

114.
कुछ ख्वाब अधूरे थे...
कुछ बाते पूरी थी...
तुम्हारे साथ प्यार तो पूरा था...
तुम्हारे बिन जिन्दगी अधूरी थी...

115.
मैं दिन...रात...सुबह..शाम...
लिखती रही....
तुम्हारा जिक्र कभी नही किया..
फिर भी हर लब्ज़ में तुम्हारा नाम लिखती रही....

116.
मैं लिखना भूल सी रही थी,
कि तुम याद आ गये...

117.
तुम्हारे साथ ही मंजिल मिले..
ऐसा जरुरी तो नही है....
तुम्हारे बिना भी कोई मंजिल हो ऐसा भी नही है...

118.
तुमसे मिल कर मुझमे...
हर रोज कुछ टूटता है....
तुम साथ रहते हो तो क्या? 
मुझसे हर रोज कुछ छूटता है....

119.
गालों से गुलाल तो कल ही छुट गया था...
पर तुम्हारी हथेलियो का एहसास अभी भी बाकी है..... 

120.
आ जाओ फिर गुलाल लगा दो मुझे...
मैं मना भी करू...
फिर भी तुम अपने रंग में रंग लो मुझे.......

Friday, 6 March 2015

तुम्हारी सभी उपलब्धियां निर्थक है....!!!

हे पुरुष..
तुम सदियों से लिखते रहे हो..
स्त्रियों की व्यथा को...
उनके दर्द को...
तुमने दावा किया है...
कि तुम उनकी भावनाओं,
को जस के तस बताया है...
दुनिया को....
तुमने उन पर हो रहे,
अन्याय को लिखा...
तुमने तो स्त्रियों पर लिख-लिख,
कर किताबो के ढेर लगा दिये...
जिसके लिये...
तुम्हे कितने ही सम्मान और,
पुरस्कार मिले है....
पर क्या...?
तुमने ये सोचा...
कि दुनिया भर की स्त्रियों का..
दर्द समझने का..
दावा करने वाले,
क्या तुमने अपने घर की स्त्री
की मन की बात समझी है....?
क्यों तुम्हारे करीब रहते हुए भी...
वो स्त्री अपनी भावनाओं को,
तुम्हे नही समझा पायी....
क्यों उसका दर्द तुम नही देख पाये....
हे-पुरुष...
तुम्हे भले ही कितने,
सम्मान मिले हो...
पर जब तक...
तुम अपने घर की स्त्री की..
आखों में अपने लिए,
सम्मान नही देख पाते हो......
तब तक तुम्हारी सभी..
उपलब्धियां निर्थक है....!!!