Tuesday, 14 July 2015

मैं तो तुम्हारी राधा बनूँगी...!!!

मैं नही तुम्हारे साथ...
किसी सफ़र पर चलूँगी...
मैं नही तुम्हारे साथ...
जिन्दगी भर रहूंगी...
मैं तुम्हारा एहसास बनूँगी...
मैं तो तुम्हारी राधा बनूँगी....
मैं नही तुम्हारे साथ..
चाँद को देखूंगी..
मैं नही तुम्हारे साथ..
किसी सुबह में रहूंगी...
मैं बनके मुस्कान....
तुम्हारे होटों पर रहूंगी...
मैं तो तुम्हारी राधा बनूँगी....
मैं नही तुम्हारे साथ...
बारिशो में भीगुंगी..
मैं तो तुम्हे छूती..
बूंदों में रहूंगी...
मैं तो तुम्हारी राधा बनूँगी....
मैं नही तुम्हारी किसी खुशी में..
शामिल रहूंगी..
ना ही तुम्हारे किसी पुरे होते..
सपने का हिस्सा ही बनूँगी..
मैं तो तुम्हारी बंद आखों के...
सपनो में रहूंगी..
मैं तो तुम्हारी राधा बनूँगी....
मैं नही तुम्हारे पन्नो पर,
बिखरे शब्दों में रहूंगी....
मैं तो तुम्हारे...
अनकहे ख्यालों में रहूंगी..
मैं नही तुम्हारे..
जवाबों में रहूंगी...
मैं तो तुम्हारी आपस में,
उलझती उँगलियों के..
सवालो में रहूंगी...
मैं तो तुम्हारी राधा बनूँगी...!!!

Sunday, 12 July 2015

डायरी में बंद सपने मेरे......!!!

फिर आज किताबो के ढेर में..
इक पुरानी डायरी कही दबी हुई मिली....
याद नही कि कब लिखी थी,
हाँ शौक तो था,
मुझे डायरी लिखने का...
हर दिन की बाते..
मैं इस डायरी में लिखा करती थी....
इक पन्ना पलटा..
तो टेड़े मेढ़े अक्षरों में...
मैंने अपना नाम लिखा था...
हँसी आयी कि,
कितनी खराब लिखावट थी मेरी...
इक और पन्ना पलटा तो..
कुछ नाराजगी से भरी से,
कुछ लाइन लिखी थी..
लिखी थी कि...
माँ मुझसे प्यार नही करती,
हर रोज मुझे स्कूल भेज देती है...
कितनी नादान थी मैं...कि 
वही बचपन की मुस्कान मेरे होटों पर आ गयी....
इक और पन्ना पलटती हूँ...
तो लिखा था कि...
मैं बड़ी हो कर डॉक्टर बनूगी...
पढ़ कर थोड़ी उदास हो गयी मैं...
ये सपना तो जैसे भूल गयी थी....मैं ...
और डायरी में लिख कर,
दब कर रह गया था....
मैंने झट से..
वो डायरी बंद कर के रख दी...
इस डर से कि...
ना जाने कितने ही सपने बंद थे,
इस डायरी में...
फिर उस डायरी को,
उसी ढेर में कही दबा कर रख दिया..
मुस्कराते हुए खुद से कहते हुए कि
डायरी में बंद सपने मेरे......!!!

Thursday, 9 July 2015

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-18

156.
मैं खुद को खो दूँ कि इससे पहले तुम मुझे ढूंढ लेना......
157.
क्यों....मैंने कभी कोई सवाल नही किया....
कि तुम्हारे साथ गुजरे लम्हों की उम्र कितनी है
158.
अब जब तुम मुझसे कुछ सुनना चाहते हो....
अफ़सोस...अब मेरे पास कहने को कुछ भी नही है....
159.
कुछ तो था तुम्हारी आँखों में...
कि तुम्हारा मुझे छोड़ कर वो जाते हुए...
वो लम्हा आज तक मेरी आँखों ठहरा हुआ है...
160.
मेरे शब्दों ने तुम्हारी खामोशिया तोड़ी है...
हर बार सवाल तुम्हारी आँखों ने किये है...
हर जवाब में मेरी पंक्तिया बोली है... 
161.
चलो तुम्हे ढूंढते है आज.....
तुम्हारा पता हर गली...
हर राह से पूछते है आज...
162.
जिधर भी देखती हूँ...
मुझे देखती तुम्हारी वो दोनों.. 
आँखे ही दिखायी देती है....
163.
मैं ना तुम्हे खोना नही चाहती...
इसलिये नही की तुम बहुत अच्छे हो...
बल्कि तुम जैसे भी हो,जो भी हो...
मुझे अच्छे लगते हो....
164.
तुम मुझे जीतने की,
इक कोशिश तो करो...
मैं तो खुद को पहले ही,
हार चुकी हूँ....
165.
अक्सर जब सफ़र में होती हूँ...
तो न चाह कर भी जिन्दगी के suffer बारे में सोचती हूँ.. 

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-17

146.
बारिश की बुँदे.....और
तुम्हारी आखों से बरसता हुआ प्यार,
कैसे कहूँ किसने.....मुझे ज्यादा भिगोया है....
147.
मैं तुम्हे लिखती रही...
अपनी कविताओं में....
और तुम हमेसा रहे..मेरी अलिखित पंक्तियों में.....
148.
बहुत खास है वो नज़र.....
जिन नजरो को मैं खास लगती हूँ......
149.
ह "सुषमा"ही है...
जिसने फैला प्रकाश दिया है...
वह "सुषमा" ही है...
जिसने अंतर्मन के सौन्दर्य से सबका जीत विश्वास लिया है...
किये विचार "सुषमा" पर सबने अलग- अलग ठहराये...
उनमे कौन सही है?
कौन गलत है?
ये कोई कैसे बतलाए..
"सुषमा" को अब अस्तित्व मिल जाने की आशा है..
निश्छल-निर्दोष सिर्फ दो शब्दों से बनती "सुषमा" की परिभाषा है...
150.
मैं इसलिये नही लिखती कि,
मुझे लिखना अच्छा लगता है...
मैं इसलिए लिखती हूँ..
कि तुम्हे पढ़ना अच्छा लगता है.....
151.
क्यों ना आज मैं कुछ ऐसा लिख दूँ....
जो तुम्हे बैचैन भी कर जाये...और सुकून भी दे जाये.....
152.
बादल है...बारिश है...बुँदे है.....सिर्फ तुम नही हो.....
153.
तुम्हारी ख़ामोशी को शब्दों में गढ़ दिया है मैंने....
जो तुम कह नही पाये मुझसे...
वो सब तुम्हारी नजरो में पढ़ लिया है मैनें.....
154.
चलो अब बाते ख़ामोशी की करते है....
बहुत अजीब है ये खामोश हो कर भी बहुत बोलती है....
155.
गर मुमकिन होता तो अपनी..
आखों के ख्वाबो को तुम्हारी पलकों पर रख देती...तुम्हे वो दिखाती जो मैं हर रोज ख्वाबो में देखती हूँ...

Monday, 22 June 2015

वो इक शाम...!!!

वो इक शाम जो...
तुम्हारे साथ गुजारी थी...
तुम्हे याद है.....
भीगी घास पर नंगे पाँव,
जब हम चल रहे थे....
तुम्हे पता है...
मैं तुम्हारा हाथ थाम कर,
दौड़ जाना चाहती थी....
वो इक शाम....
जब काफी के साथ चुपके से,
इक दुसरे को देख कर,
हम मुस्करा देते थे...
वो इक शाम....
जो सिर्फ तुम्हारी..
इक मुस्कान को देखने के लिए,
मैंने तुम्हारे साथ गुजारी थी....
वो इक शाम....
जब ख़ामोशी भी गुनगुनायी थी....
लिखा कुछ था मैंने...
वो ग़ज़ल तुमने सुनाई थी....
वो इक शाम....
जो ढलते हुए अपने साथ,
तुम्हारी याद लायी थी....
वो इक शाम....
शायद मैंने कुछ कहा था...
या फिर तुमने कानो में,
चुपके से कोई बात बतायी थी....
तुम्हारे साथ बीती,
हर शाम मेरी आने वाली...
हर शामो को महकाती है....
जब तुम नही होते हो...
तो बन कर हमसफ़र...
मेरे साथ बैठ जाती है...
वो इक शाम...!!!

Saturday, 13 June 2015

इक साथ...!!!

मैं कब से ढूंढ रही...
इक साथ...
जो मेरे डरने से,
पहले मेरे हाथ थाम ले...
इक साथ जो मेरी आखों में,
आँसू आने से पहले,
होटों पर मुस्कान दे....
इक साथ जो...
मैं जब जिन्दगी से...
थक जाऊं तो...
वो मेरी आखिरी कोशिश बन के...
मुझको सम्हाल ले....
इक साथ जिसके साथ,
तपती धुप में भी चलना,
मुझे छाव लगे.....
इक साथ जिसके लिये....
मैं खुद को खो भी दूँ..
तो वो मुझसे कहे....
तुम्हारे लिये मैं हूँ ना...!!!

Friday, 12 June 2015

इन शब्दों के बिना....!!!

कल रात सपने में...
मेरी शब्दों से मुलाकात हुई...
बिखरे पड़े थे...
इधर-उधर..बैचैन से...
मुझे देखा...बड़ी नारजगी से...
शिकायत थी उन्हें मुझसे...
कि मैंने उन्हें क्यों...
किसी कविता में पिरोया नही...
उन्हें नाराजगी थी....
कि क्यों....
मैंने उनसे अपने दिल की,
बाते नही कही....
मैं चुप थी....
ख़ामोशी से बिखरे पड़े...
शब्दों को देख रही थी..
तभी इक शब्द ने...
मुझसे आ कर कहा...
कि तुम्हारी ख़ामोशी को भी,
शब्दों की जरुरत पड़ेगी...
कि अचानक....
इक शब्द मुस्कराहट बन कर,
मेरे लबो को छू गया....
और सारी रात शब्दों से,
अपनी आपबीती कहती रही...
बिखरे शब्दों से साथ...
अपने बिखरे मन को भी,
समेटती रही....
सच ही तो है..
कहाँ मैं कुछ भी हूँ...
इन शब्दों के बिना....!!!