Tuesday, 12 July 2016

मेरी कविताओं में उतरते हो....!!!

तुम जब शब्द बन कर,
मेरी कविताओं में उतरते हो,
मेरे जहन की गहराइयों से गुजरते हो......
तुम जब भी बारिश की बुँदे,
बन कर मुझ पर बरसते हो,
भीगे हुए लफ़्ज़ों में...
मेरी कविताओ में उतरते हो,..
तुम जब कभी पुरवाई के ठन्डे झोकों में,
मुझे छु कर गुजरते हो,
ठिठुरते एहसासो से,
मेरी कविताओ में उतरते हो..
तुम जब कभी पूरनमासी के चाँद बन कर,
मुझे देखते हो...
इठलाते-झिझकते अंदाज़ से,
मेरी कविताओ में उतरते हो....
तुम जब कभी अमावस्य की रातो में,
मुझे ढूंढ़ते हो...
जुगनुओं की तरह,
मेरी कविताओं में उतरते हो....
तुम जब कभी...
सूरज की पहली किरण बन कर,
मेरी पलको को चूमते हो,
सर्दियों की खिली धुप से..
मेरी कविताओं में उतरते हो....
तुम जब कभी....
मेरी कविताओं को पढ़ते हो,
मेरी खामोशिया 'तुम' बन कर,
मेरे कागज़ों पर उतरती है..
तुम जब शब्द बन कर,
मेरी कविताओं में उतरते हो,
मेरे जहन की गहराइयों से गुजरते हो......

Sunday, 3 July 2016

बारिश की बूंदों के साथ....!!!

जाने कितनी बार,
बारिश की इन बूंदों के साथ,
हम-तुम खेले है...
इन बूंदों के लिये ही,
मिले और बिछड़े है...
तुम्हारी जिद इन बूंदों को पकड़ लेने की,
मेरी जिद इन बूंदों में भीग जाने की...
ख्वाइशें फिर चाहे अलग हो,
बारिश की बूंदों के साथ,
खेलने की चाह इक थी....

गली के उस मोड़ पर......!!!

आज भी गली के उस मोड़ पर,
वो आम का पेड़ खड़ा है,
मेरे साथ वो भी....
तुम्हारे आने के इंतजार में,
तुम्हारी राह देखता है...
जिसके पीछे हम-तुम,
छुप्पन-छुपाई खेलते थे.....
जिसकी डाली पर,
सावन के झूले पड़ते थे,
और तुम मुझे झुलाते थे..,
ना जाने मैंने कब तुम्हे ढूँढने के लिये,
मैंने अपनी आँखे बंद की,
तुम यूँ छुप गये कि...
आज भी तुम्हे नही ढूंढ़ नही पाई...
वो झूला आज भी झूलता है,
ऐसे कि जैसे तुम उसे झूला रहे हो....
आज भी गली के उस मोड़ पर खड़े,
उस पेड़ के पास से जब मैं गुजरती हूँ,
कुछ देर अपनी आँखे बंद,
करके तुम्हे ढूँढती हूँ...

Saturday, 25 June 2016

जब तुम जा रहे थे....!!!

जब तुम जा रहे थे,
मैं भी तुम्हारी आँखों में कुछ ढूंढ रही थी,
जो कभी मेरे लिये हुआ करता था....
जिसे महसूस करके,
मैंने जिंदगी के तमाम ख्वाब बने थे...
मैं ढूंढ रही थी तुम्हारी आँखों में,
वो कशिश जो किस्से मैंने,
प्यार की कहानियों में सुने थे....
मैं तुम्हारी आखों में,
वो ढूंढ देखना चाहती थी,
जिसमे मैं सबसे खूबसूरत लगती थी
मैं तुम्हारी आँखो में,
वो उम्मीद ढूंढ रही थी,
जो मेरे साथ मंजिल तक पाने की थी...
मैं तुम्हे रोकना चाहती थी,
पर मैंने रोका नही,क्यों की...
मैं तुम्हारी आँखों में,
वो चाहत ढूंढ रही थी,
जो मेरे बिना कुछ कहे,
मेरी आँखों को पढ़ लेती थी....

Wednesday, 22 June 2016

जब मैं होती हूँ अकेली ...!!!

तुम्हारे साथ हो कर भी,
जब मैं होती हूँ अकेली ...
फिर शब्द भी बयाँ नही कर पाते,
वो टीस दिल की.....
कि जब तुम मिले तो,
मैंने सब कुछ छोड़ कर,
तुम संग होली...
तुम्ही मेरे हमसफ़र थे,
तुम्ही मेरी सखी....सहेली....
किससे कहूँ बात दिल की,
किसके साथ रो लूँ....
तुम्ही तो थे....
जिससे कहती थी सब कुछ,...
पर ना जाने क्यों....
तुम्हारे साथ हो कर भी,
जब मैं होती हूँ अकेली ...
फिर शब्द भी बयाँ नही कर पाते,
वो टीस दिल की.....!!!

Tuesday, 21 June 2016

आज मैंने खुद को पढ़ा है....!!!

आज मैंने खुद को पढ़ा है...
कितना कुछ बेतरतीब बिखरा हुआ,
मुझमे रह गया....कितने ही सवाल,
मैंने खुद से भी छिपा रखे है,
कितने ही जवाब,
मैंने खुद को दिये ही नही है....
आज मैंने खुद पढ़ा है....
शब्दों को तो गढ़ती रही,
खुद को कोई छवि ना दे पाई,
कितने ही ख्याल जहन में,
अधूरे से रह गये....कितनी ही गलतियां,
मैंने खुद से की है...
होठो पर मुस्कान,आखों में चमक लिये...
मेरे अंदर कुछ हर पल...
टूट कर रोता रहा है....
कितनी ही बार मैंने,
खुद से मुँह मोड़ लिया है...
आज मैंने खुद को पढ़ा है.....!!!

Friday, 17 June 2016

राधा ना बन पाई.....!!!

मैं तुम्हारी प्रेमिका तो बन गई
तुम्हारी संगिनी बन गई,
पर तुम्हारी दोस्त नही बन पायी.....
तुम्हारा प्यार.....तुम्हारी हर चीज पर,
अधिकार तो मिल गया मुझे,
पर तुम्हारे एहसासों को ना छु पाई.....
तुम्हारे साथ सफ़र पर तो,
चलती रही साथ मैं,
पर तुम्हारे ख़्यालो में ना उतर पाई...
जिस तरह सावन की पहली बूंद,
सिर्फ पपहिये की होती है,
मैं तुम्हारी वो पहली ख़ुशी ना बन पाई,
मैं तुम्हारी जिम्मेदारी तो बन गई,
पर फ़िक्र ना बन पाई...
मैं तुम्हारी हकीकत तो बन गई,
पर तुम्हारी कल्पना सी ना बन पाई...
मैं तुम्हारी अर्धग्नि तो बन गई,
पूरी हो कर भी अधूरी ही रही....
मैं तुम्हारी रुक्मणी तो बन गई,...
पर राधा ना बन पाई.....!!!