आज मुझसे यूँ ही एक दोस्त पूछ बैठी की मैंने कुछ क्यों नही लिखा? दिल्ली
वाली घटना पर मैं उसके इस सवाल पर मेरे पास कोई जवाब नही था और....मैं खामोश
रही....और सोचने लगी,ऐसे बहुत सारे सवाल थे जिनका जवाब में मेरे पास सिर्फ....एक
लम्बी ख़ामोशी थी....जब से मैंने इस घटना के बारे में पढ़ा या सुना है मैं समझ
नही पा रही हूँ की मैं क्या कहू?कैसे कहूँ? मैं उस दिन से हर उस शख्स से बच
रही हूँ जो इस बारे में बात भी करता है क्यों की मैं अगर ये कहूँ की हाँ
मुझे भी दुःख हुआ,वो कम ही होगा क्या? मैं सच में इस घटना से नाराज हूँ या
उससे भी कही ज्यादा मैं दुखी हूँ....सच कहूँ तो बहुत कोशिश की अपने दर्द को
शब्दों में लिखने की पर मेरे शब्दों में इतनी शक्ति ही नहीं जो उस दर्द बयां कर सके, मैं समझ नही पा रही हूँ की मैं किस कानून की बात करूँ ? ऐसा क्या बदल दूँ कि जो कुछ हुआ वो ठीक हो जाए....दुःख होता है जब जिस देश में सोनिया जी,शीला जी, मीरा कुमार जी,मायावती जी जैसे लोग हो वहां भी एक नारी के दर्द को समझाने के लिए हमें सड़को पर उतरना पड़ रहा है, कहते है...एक नारी ही दूसरी नारी का दर्द समझ सकती है पर ये क्या है? मैं हैरान
हूँ की वो आम आदमी अपना सब कुछ छोड़ का निस्वार्थ भाव से सिर्फ इसलिए लड़ रहा
है कि इन्साफ हो सके, और वो अभिनेता जो देश की सेवा करने की बड़ी -बड़ी बाते
करते है वो चुप हो कर देख रहे है...हाँ उन्हें दुःख हुआ ऐसा कह कर चुप क्यों है
? मैं नही समझ पाती हूँ कि अभी कुछ दिन ही हुए अन्ना हजारे के आन्दोलन
में यही अभिनेता आकर समर्थन की बात कर रहे थे, अब जब देश की नारी के सम्मान
की बात हो रही है तो ये ख़ामोशी क्यों है...? बस इन्ही सवालो के जवाब में मुझे सिर्फ एक ख़ामोशी मिली है...ये ख़ामोशी क्यों है??
Wednesday, 26 December 2012
Sunday, 16 December 2012
मेरे हाथो की ये चूड़ियाँ न जाने क्या गुनगुना रही है....!!
मेरे हाथो की ये चूड़ियाँ न जाने,
क्या गुनगुना रही है....
खनक-खनक मेरे हाथो में,
याद तुम्हारी दिला रही है.....
पूछ न ले कोई सबब इनके खनकने का,
मैं इनको जितना थामती हूँ...
नही मानती मेरी बे-धड़क
शोर मचा रही है,
मेरे हाथो की ये चूड़ियाँ
न जाने क्या गुनगुना रही है.....
मैं कुछ कहूँ न कहूँ मेरा हाल-ए-दिल...
मेरी चूड़ियां सुना रही है.....
आज भी तुम्हारी उँगलियों की छुअन से,
मेरी चूड़ियाँ शरमा रही है...
मेरे हाथो की ये चूड़ियाँ न जाने क्या गुनगुना रही है..
मेरी हाथो से है लिपटी,
एहसास तुम्हारा दिला रही है.....
मैं कब से थाम कर बैठी हूँ,
अपनी धडकनों को....
जब भी खनकती है मेरे हाथो में,
धड़कने तुम्हारी सुना रही है.....
मेरे हाथो की ये चूड़ियाँ न जाने क्या गुनगुना रही है..
तुम्हारी तरह ये मुझसे ये रूठती भी है,
रूठ कर टूटती भी है....
मैं इनको फिर मना रही हूँ....
सहज कर अपने हाथो में सजा रही हूँ,
ये फिर मचल कर तुम्हारी बाते किये जा रही है....
मेरे हाथो की ये चूड़ियाँ न जाने क्या गुनगुना रही है..
क्या गुनगुना रही है....
खनक-खनक मेरे हाथो में,
याद तुम्हारी दिला रही है.....
पूछ न ले कोई सबब इनके खनकने का,
मैं इनको जितना थामती हूँ...
नही मानती मेरी बे-धड़क
शोर मचा रही है,
मेरे हाथो की ये चूड़ियाँ
न जाने क्या गुनगुना रही है.....
मैं कुछ कहूँ न कहूँ मेरा हाल-ए-दिल...
मेरी चूड़ियां सुना रही है.....
आज भी तुम्हारी उँगलियों की छुअन से,
मेरी चूड़ियाँ शरमा रही है...
मेरे हाथो की ये चूड़ियाँ न जाने क्या गुनगुना रही है..
मेरी हाथो से है लिपटी,
एहसास तुम्हारा दिला रही है.....
मैं कब से थाम कर बैठी हूँ,
अपनी धडकनों को....
जब भी खनकती है मेरे हाथो में,
धड़कने तुम्हारी सुना रही है.....
मेरे हाथो की ये चूड़ियाँ न जाने क्या गुनगुना रही है..
तुम्हारी तरह ये मुझसे ये रूठती भी है,
रूठ कर टूटती भी है....
मैं इनको फिर मना रही हूँ....
सहज कर अपने हाथो में सजा रही हूँ,
ये फिर मचल कर तुम्हारी बाते किये जा रही है....
मेरे हाथो की ये चूड़ियाँ न जाने क्या गुनगुना रही है..
Tuesday, 11 December 2012
मैं कहाँ शब्दों में बांध पायी हूँ......तुम्हे ......!!!
मैं कहाँ शब्दों में बांध पायी हूँ.......तुम्हे
अब तक जितना भी लिख चुकी हूँ....तुम्हे
फिर भी अधुरा-अधुरा सा रहा है.....
अभी कहाँ पूरी तरह से जान पायी हूँ......तुम्हे
मैं कहाँ शब्दों में बांध पायी हूँ......तुम्हे
मैं कहाँ शब्दों में बांध पायी हूँ......तुम्हे
जब यकीन होता है कि,
तुमने अपना मान लिया है मुझे....
जब भी यकीन होता है कि,
मैंने जान लिया है........तुम्हे,
ये भ्रम भी टूटा है हर बार,
मैं कहाँ खुद में ढाल पायी हूँ.......तुम्हे मैंने जान लिया है........तुम्हे,
ये भ्रम भी टूटा है हर बार,
मैं कहाँ शब्दों में बांध पायी हूँ......तुम्हे ......!!!
Saturday, 1 December 2012
हर पल हर लम्हा........!!!
हर पल हर लम्हा खुद से ही लड़ रही हूँ मैं...
सवाल जवाबो के इन उलझनों में,
खुद के अन्दर चल रहे.....तुफानो से हर पल
बिखर रही हूँ मैं.......
बिखर रही हूँ मैं.......
एक तरफ मेरे साथ मेरी भावनाओ की गहराइयाँ है.....
इक तरफ मेरी तन्हाईयाँ है,
मंजिल की तलाश में दर-दर भटक रही हूँ मैं.....
किसी के इन्तजार में अंजान किसी आहट पर,
सहम कर ठहर रही हूँ मैं......
अपनी चाहतों,अपनी ख्वाइशों में,
अपनी चाहतों,अपनी ख्वाइशों में,
टूटने की हद तक गुजर रही हूँ मैं.......
इक रौशनी की तलाश में कितने,
इक रौशनी की तलाश में कितने,
अंधेरो से घिर रही हूँ मैं.....
इतनी तन्हा हो गयी हूँ कि......
खुद को भी अनजान सी लग रही हूँ मैं........!!!
Wednesday, 14 November 2012
बस अब और नही....!!!
साल बदलते है....तारीखे बदलती है..
घड़ी की सुइयों की तरह,
कुछ भी ठहरता नही है.....
हर साल की तरह दिवाली आती है होली आती है,
न दीयों की रौशनी ही ठहरती है...
न ही होली का कोई रंग ही चढ़ता है...मेरी जिन्दगी में...
हर बार ख्वाब टूटते है उम्मीदे टूटती है....
हर बार सम्हलती हूँ और.....
फिर टूट कर बिखरती हूँ मैं....
हर बार ढूंढ़ कर लाती हूँ खुद को,
और हर बार भीड़ में खो जाती हूँ...
खुद के ही सवालो में उलझ कर रह जाती हूँ ......
सफ़र पर चलती हूँ सबके साथ,
सभी मुझसे आगे निकल जाते है,
और मैं न जाने किसके
इन्तजार में पीछे रह जाती हूँ......
इन्तजार में पीछे रह जाती हूँ......
डायरी के खाली पन्नो की तरह,
मैं भी खाली हो चुकी हूँ....
न शब्द ही मिलते है मुझे,
न ही अर्थ समझ पाती हूँ.....अपने इस खालीपन का...
थक चुकी हूँ....
इन शब्दों से खुद को बहलाते-बहलाते,
थक चुकी हूँ....
थक चुकी हूँ....
खुद को समझाते-समझाते,
बस अब और नही....
बस अब और नही......
ठहर जाना चाहती हूँ.....
बिखर जाना चाहती हूँ,
आसमां में सितारों की तरह....
मिल जाना चाहती हूँ,
मिट्टी में खुसबू की तरह....
बस अब और नही.....अब ठहर जाना चाहती हूँ......!!!
Saturday, 10 November 2012
चलो पंक्तियाँ दियो की लगा देते है...!!!
चलो पंक्तियाँ दियो की लगा देते है,
जहाँ तक हद है नज़रों की,
अँधेरा वहां तक मिटा देते है....
अपनों के लिए बहुत कुछ किया है अभी तक
एक दिया किसी अजनबी के लिए,
जला कर उसे भी अपना बना लेते है.... एक दिया जला कर किसी के बिखरे हुए,
ख्वाबों को समेट कर
उसकी आखों में,
कुछ और ख्वाब सजा देते है....
एक दिया जला कर किसी के उदास चहेरे,
पर एक मुस्कान ला देते है....
एक दिया जला कर किसी के गुजरे हुए,
खुबसूरत लम्हों को आज में मिला देते है....
एक दिया जला कर किसी राहों में,
उसे मंजिल से मिला देते है....
एक दिया जला कर हमसे रूठे हुए
उजालो को मना लेते है,,,,,,
चलो पंक्तियाँ दियो की लगा देते है
जहाँ तक हद है नज़रों की,
अँधेरा वहां तक मिटा देते है........!!!
Thursday, 1 November 2012
कोई मिल जाए ऐसा...!!!
कोई मिल जाए ऐसा..... जो सिर्फ,
मेरे हाथो को थाम कर चलना चाहे.......
कोई मिल जाए......
ऐसा जो मेरे साथ,
चाँद को निहारते हुए सारी रात गुजारना चाहे........
कोई मिल जाए ऐसा....जो मेरी ख़ामोशी को समझ जाए,
जो मेरी मेरी धडकनों को सुनना चाहे.........
कोई मिल जाए ऐसा...
जिसके काँधे पर सर रख,
मैं दुनिया को भूल जाऊं....
जो मेरी साँसों में घुलना चाहे.........
कोई मिल जाए ऐसा...
जिसकी आखों में,
मैं बेइंतहा प्यार देखूं,
जो मेरी आखों में,
सिर्फ खुद को देखना चाहे......
कोई मिल जाए ऐसा.....
जिससे हर बार मैं जीत जाऊं,
जो मेरी एक मुस्कान पर....
अपना सब कुछ हारना चाहे.......
कोई मिल जाए ऐसा...
जिसके साथ गुजरा इक-इक पल,
एक पूरी जिन्दगी लगे...
जो सिर्फ मेरे साथ....
अपनी पूरी जिन्दगी जीना चाहे......
कोई मिल जाए ऐसा...
जिसके सजदे सर,
मेरा हमेशा झुकता रहे,
जो अपनी दुआओं में...
मुझे ही पाना चाहे....
कोई मिल जाए ऐसा...जिसका एहसास,
मेरी हर कविता में हो,
जो मेरे लिखे...
हर शब्द का अर्थ बनना चाहे......!!!
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