रोज मर्रा के कामो में मैं व्यस्त,
जैसे ही कलेंडर का महीना बदला की देखा कि,
1 February है, ये तो वही महीना,
वही दिन....
जब तुम्हारा मेरे साथ ख़तो का,
सिलसिला शुरू हुआ था,
मुझे याद है....
तुम मुझे प्यार से हीर कहते थे,
आज ही के दिन तुमने मुझे,
पहला खत दिया था,जिसको मैंने इतने बार पढ़ा था,
कि उस खत का इक-इक शब्द,।जैसे जहन में उतर गया, जिसमे लिखा था...
मेरी हीर,
आज के दिन से मैं तुम्हे हर रोज इक खत लिखूंगा...valentineday तक.... तुम्हे लिखूंगा किस तरह तुम मेरे ख़्यालो में रहती हो...तुम्हे लिखूंगा कि अपनी feelings को बताने के लिये,मेरे इक खत काफी नही है..मैं तुम्हारे करीब खुद को इन ख़तो के सिलसिलों से ले आऊंगा...जिसकी खुसबू तमाम उम्र तुम्हारे साथ रहेगी....
सिर्फ तुम्हारा
राँझा
Sunday, 31 January 2016
Valentine day खतो की डायरी...
Tuesday, 12 January 2016
मेरे शब्दों के है.......,!!!
तुमसे रिश्ते मेरे सभी...
शब्दों के है....
तुमने सुना नही कभी,
मैंने कहा नही कभी.....
तुम पढ़ लेते हो मुझको,
मैं लिख लेती हूँ तुमको..
तुमसे एहसास मेरे सभी....
शब्दों के है....
हम सदा अंजान ही रहे इक दूजे से,
तुम मिल लेते हो मुझसे
मैं छु लेती हूँ तुमको,
तुमसे बयाँ करते जज्बात मेरे सभी,
शब्दों के है....
इक दुरी सी थी हमारे दरमियाँ,
इक गहरी खामोशी की तन्हाईयाँ,
तुम्हारे सवालो के जवाब सभी,
मेरे शब्दों के है.......!!!
Friday, 8 January 2016
तुम भी इस घर में आते हो....!!!
जब भी रात में दरवाज़े के हिलने की,
आहट सी रहती है...
यूँ ही लगता है कि....
जैसे हवा के झोंके के साथ...
तुम भी इस घर में आते हो.....
तुम्हे याद है घर का वो लॉन...
जिसकी बगियाँ को,
तुमने सींचा था,
मुझे याद है कि...
तुम अपनी क्यारी के फ़ूलो को,
मेरे नाम से पुकारते थे...
हवा के झोकों से जब वो झूलते है..
तो यूँ लगता है कि...
तुम भी इस घर में आते हो....
तुम्हे याद है वो किचन,
जिसमे कितनी ही बार तुमने,
वो अदरक वाली चाय बनायीं थी,
हवा में आज भी उस चाय की,
खुसबू महसूस करती हूँ..
तो लगता है...
तुम भी इस घर में आते हो...
तुम्हे याद है वो दर्पन,
जिसमे मैं जब सजती संवरती थी,
वो तुम्हारा पीछे से,
मुझे बाँहो में भर लेना...
हवा के झोकों में वो परछाइयाँ,
आज भी दिखती है..
तो लगता है कि...
तुम भी इस घर में आते हो..
तुम्हे याद है वो खिड़की,
जिससे मैं घंटो चाँद को निहारती थी...
आज भी जब खिड़की के पर्दे,
हवा में लहरा कर मुझे छूते है..
तो लगता है कि...
तुम भी इस घर में आते हो.....
तुम्हे याद है वो तकिया,
जिससे कितनी ही लड़ाईया,
तुमने हारी...मैंने जीती है....
मैं जब भी हवा के झोकों में,
तुम्हे अपनी सांसो में पाती हूँ...
तो तकिया को समेट कर,
अपने सीने से लगा लेती हूँ....
जब भी रात में दरवाज़े के,
हिलने की आहट सी रहती है..
यूँ ही लगता है कि...
जैसे हवा के झोंके के साथ,
तुम भी इस घर में आते हो.....
Wednesday, 30 December 2015
कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-24
Tuesday, 29 December 2015
इस साल को ना जाने दूँ.....!!!!
नए साल की आहट है...
फ़िजा में है शोर, जश्न है,....
पर मैं चुप हूँ,
इस इंतजार में कि...
तुम मुझे अपने साथ गुजरे साल,
तुम्हारे बीते पलों का,
तुम्हारी होटो पर सजाई..
हर ख़ुशी का..
तुम भी मुझसे कुछ कहोगे,
तुम्हारे वो दो शब्द सुनने के लिये,
मेरी धड़कनो में शोर है...
बेचैन कब से गुजरते हर पल,
हर सेकेंड को गिन रही है..
कभी खुशी से बादलो में उड़ रही हूँ,
तो कभी उदास हो कर बैठ जाती हूँ,
कि ये साल भी.....
इंतजार में ना गुजर जाये,
तुम सभी को तो बधाई दे दो,
बस मुझसे कहना रह जाये....
क्यों ना गुजरते हर लम्हे को,
मैं बांध कर रख लूँ....
जब तक तुम मुझसे,
वो दो शब्द ना कहो,
तब तक मैं...
इस साल को ना जाने दूँ.....!!!!
Thursday, 24 December 2015
कैलेंडर के हर दिन का हिसाब लिख दूँ.....!!!
ये साल जा रहा है....
क्यों ना तुम्हारी मुस्कराटे लिख दूँ,
तीन सौ पैसठ दिन की,
सारी शिकायते लिख दूँ....
मैं मिनटों का...
अपना रूठना लिख दूँ,
सेकेंडो में...
तुम्हारा मनाना लिख दूँ,
तुमसे मिलने के उंगलियों पर..
गिने दिन लिख दूँ,
पहरो तुम्हारे इंतजार में...
गुजरे वो पलछिन लिख दूँ,
तारीखों में कैद.....
वो तुम्हारी यादे लिख दूँ,
हर पल जहन में मुस्कराती,
तुम्हारी वो बाते लिख दूँ...
वो सर्द अँधेरी रातो की सिसकिया,
याद में भीगी आँखे लिख दूँ,
वो रात भर जागती आँखो का,
सवेरा लिख दूँ,
क्यों ना कुछ दर्द,
तुम्हारा अपना लिख दूँ,
कुछ रातो को...
बिखरे सपने लिख दूँ,
कुछ् शामो में...
बुनते ख्वाब लिख दूँ,
ये साल जा रहा है क्यों ना,
कैलेंडर के हर दिन का हिसाब लिख दूँ...
फूलों की आयी बहार लिख दूँ,
पल में बिखरे पतझड़ लिख दूँ,
कदम चूमती कामयाबी लिख दूँ,
ठोकरों के संघर्ष लिख दूँ...
ये साल जा रहा है क्यों ना,
हर अर्थ और अनर्थ को बिसरा कर,
पुराने कैलेंडर को हटा कर,
फिर नया कैलेंडर पर,
नया इतिहास लिख दूँ,
ये साल जा रहा है क्यों ना,
कैलेंडर के हर दिन का हिसाब लिख दूँ.....!!!
Wednesday, 23 December 2015
इक किताब बन जाऊँ...!!!
इक किताब बन जाऊं,
तुम अपने हाथों में थामो मुझे,
अपनी उंगलियों से...
मेरे शब्दों को छु कर,
मुझे अपने जहन में....
शामिल कर लो...
क्यों ना मैं..
इक किताब बन जाऊँ,
मुझे तुम पढ़ लो समझ लो,
जब थक कर सो जाओ,
तो मैं तुम्हारे सीने से लग जाऊं.....
क्यों ना...
मैं इक किताब बन जाऊं....
कुछ पुराने ख़त..
कुछ सुखे फूल,
मुझमे कही छिपा दो..
मैं तुम्हारे एहसासों से
फिर इक बार महक जाऊं....
जिसके पन्नों पर....
तुम मेरे ख़्यालो में,
मेरा नाम लिख दो,
तुम्हारे गुजरे वक़्त की...
मैं हमराज़ बन जाऊं,..
क्यों ना मैं.....
इक किताब बन जाऊँ...
तुम मुझे छोड़ कर जाना भी चाहो,
क्यों ना इक किताब बन कर,
तुम्हारे पास रह जाऊँ....!!!